संगीत, संगत और नृत्य पर फराज़ अहमद, मोहित गंगानी, आशीष गंगानी से गुफ्तगू

Mohit Gangani, Faraz Ahmed and Ashish Gangani

नृत्य में संगत कलाकार ज़्यादातर मंच के एक ओर एक पंक्ति में बैठे होते हैं, नर्तक को देखते हुए। कार्यक्रम के अंत में इन कलाकारों को मंच पर बुलाया जाता है और इनके नाम लेते हुए इन्हें कार्यक्रम की सफलता पर सम्मानित किया जाता है। लेकिन आज हम जिन वादकों और गायक के साथ बात-चीत कर रहे हैं, उन्हें हमने मंच पर सामने बैठे देखा है, दर्शकों की ओर पीठ किए हुए, या नर्तकों के साथ मंच के बीच प्रस्तुति करते हुए। ऐसा आभास होता है कि यह नृत्य की धारा का ही एक हिस्सा हैं, जो नर्तक के साथ मंच पर मौजूद हैं। उसी क्षण आपको आभास होता है कि यह संगत कलाकार कितने महत्वपूर्ण हैं। किसी भी production के यह एहम हिस्सा हैं।

फराज़ अहमद, मोहित गंगानी और आशीष गंगानी – यह तीनों कथक गुरु अदिति मंगलदास की Drishtikon Repertory के सदस्य हैं। फराज़ अहमद मोरादाबाद घराने की सातवीं पीढ़ी हैं, और यह घराना हिंदुस्तानी संगीत के गायन और सारंगी की प्रथा के लिए प्रचलित है। मोहित और आशीष प्रख्यात गंगानी परिवार के सदस्य हैं, जो जयपुर घराने के कथक और तालवादन की प्रथा को आगे बढ़ा रहे हैं। अदिति मंगलदास या दृष्टिकोण के किसी भी कार्यक्रम में यह तीनों पाए जाते हैं। मैंने कई बार इनका वादन सुना है और हर बार इनकी प्रतिभा से बहुत आनंदित हुई हूँ। फराज़ गाते हैं, सारंगी बजाते हैं और ज़्यादातर सभी कार्यक्रमों का संगीत देते हैं। मोहित तबला बजाते हैं और आशीष पखावज। यह तीनों मिल कर दृष्टिकोण के अधिकतर कार्यक्रमों का संगीत बनाते भी हैं और बजाते भी।

मेरे इस लेख में मैंने यह दर्शाने का प्रयास किया है कि संगीतकार, संगीतज्ञ और वादक नृत्य के कार्यक्रम के कितने महत्वपूर्ण अंग हैं। मैंने इन तीनों से interview करते हुए यही तथ्य साबित किया है कि संगत कलाकार हर प्रस्तुति को बुन कर रखते हैं, और उनके लिए यह कितना कठिन है, और कितना प्रशंसनीय है, कि वह एक नयी प्रथा को अपना पाते हैं, जब कि वह स्वयं शास्त्रीय संगीत की परंपरा के शिष्य होते हैं। समझा है कि उनके लिए एकल और संगत में गाने या बजाने में कितना अंतर है। अदिति मंगलदास की प्रस्तुति ‘बैठक’ दिल्ली में हाल ही में हुई थी, जिसमें इन तीनों ने अंजना सिंह के कथक, 15 वर्षीय निशित गंगानी के तबलावादन, और मनोज सोनाग्रा के कथक-आधारित आधुनिक नृत्य में संगत की थी। यह बात-चीत उसी के बाद हुई थी। मोहित और आशीष ने यह बताया कि वह अपने परिवार की तीसरी पीढ़ी हैं जो अदिति के साथ काम कर रहे हैं। अदिति कथक की एक जानी-मानी कलाकार और गुरु हैं, जिंहोने कथक की हर रूढ़ि को तोड़ा है। उनके शिष्य भी उनकी repertory में कुछ ऐसा ही काम करते हैं। इन तीनों ने यह भी बताया कि दृष्टिकोण में विविध नृत्य और संगीत की परम्पराओं में काम करते हुए इन्होंने बहुत कुछ सीखा है। Within जैसी productions में इस विधान को तोड़ा गया है की संगत कलाकार एक नृत्य कार्यक्रम में कैसे प्रस्तुत होते हैं। यह तीनों अदिति को ही इस बात का श्रेय देते हैं कि उन्होंने संगीतकारों को दर्शकों के सम्मुख नर्तकों के साथ ला खड़ा किया है।

प्रश्न: आपने तालीम कब और कैसे शुरू की?
मोहित: मैं मोहित गंगानी हूँ । चार साल की उम्र से मेरा रुझान संगीत की ओर हुआ । घर में माहौल ऐसा रहता था की 24 घंटे संगीत का ही वातावरण था। हमें भी लगा कि घर के बड़े-बुज़ुर्गों ने इतना नाम कमाया है, क्या हम भी इस विधा में कुछ करने के लायक हैं?

प्रश्न: क्या घर से दबाव भी था? 
मोहित: दबाव ऐसा नहीं कि तुम्हें यही करना है। हाँ, यह था कि तुम किस घर से हो, उनकी औलाद हो, तो तुम्हें करना चाहिए। मेरे गुरु श्री फतेह सिंह गंगानी जी और विख्यात कथक गुरु श्री राजेंद्र गंगानी जी मेरे परिवार से हैं, इनसे मैंने लय और लयकारी सीखी है। घर में ही सब कुछ था तो कोशिश नहीं करनी पड़ी । कुछ hobbies थीं जिन्हें भूलना पड़ा, जैसे क्रिकेट। आज 27 साल की उम्र है, यही कर रहे हैं, और सोचा है कि आगे भी तबले को ही profession बनाना है।

Ashish Gangani


आशीष: मेरा नाम आशीष गंगानी है। मैंने 10 साल की उम्र से तबला सीखना शुरू किया। फिर भाईजी (फतेह सिंह गंगानी) को पखावज बजाते देखा तो 14 साल की उम्र से पखावज सीखना शुरू किया। घर में पिताजी से सीखा और भैया से सीखा। सोचा कि तबले के साथ पखावज भी अच्छे से सीखना है। फिर मैंने केंद्र में admission ले कर पंडित रवि शंकर उपाध्याय जी से सीखा। पाँच साल का course पूरा किया, उनके घर पे जाकर भी सीखा। फिर यहाँ दीदी के पास दृष्टिकोण में बहुत कुछ सीखा। पर अब भी मन में और सीखने की चाह रहती है।

प्रश्न: क्या घर के माहौल की वजह से ऐसा हुआ या कुछ दबाव घर की ओर से था?
मोहित: नहीं, घर की तरफ से ऐसा दबाव नहीं था, परंतु जब भी घर रहते तो संगीत और नृत्य का वातावरण होता। दिन में कहीं भी गए, खेलने भी गए, तो रात को वापस आ कर फिर वही माहौल मिलता था। सोचा, जब गंगानी हैं तो कुछ करना भी चाहिए। यह हमारी रग-रग में है।
फराज़: मेरा नाम फराज़ अहमद है। मैंने गाने की तालीम 6 वर्ष की आयु से घर में ही शुरू की। हमारे घर में भी गाना-बजाना खानदानी काम है। घर से कोई ऐसे दबाव नहीं था। खुद को शौक हुआ तो गाना और सारंगी भी सीखी। हम दो भाई दोनों गाना गाते थे। मैं दीदी के साथ आ गया तो कथक के साथ भी गाने लगा। मैं अपने घर में सातवीं पीढ़ी हूँ (संगीत में)। हमारे घर में गाना, सारंगी, तबला — इसी सब का माहौल बना रहता है।

प्रश्न: आप सब अपने आप में बहुत मंझे हुए कलाकार हैं — संगत और solo में आपके कैसे-कैसे अनुभव रहे हैं? आपको किसमें लगता है कि आपकी प्रतिभा प्रखर रूप में सामने आती है?
मोहित: सीखना है तो उसके लिए कोई भी format सही है। मेरा सोचना यह है कि जब आप solo बजाते हैं तो अपना काम कम होता है । हम अपने उस्तादों के कायदे बजाते हैं, जो बड़े-बुजुर्ग बना के गए है। उसमें अपना योगदान कम होता है। लेकिन उस्ताद ज़ाकिर हुसैन साहब ने उसे अलग ही मुकाम दे दिया है। वह एक ऐसे pioneer थे जिन्होंने तबले को एक संगत के वाद्य से solo instrument बनाया। ज़ाकिर हुसैन जी और पंडित किशन महाराज की यह तबले को बहुत बड़ी देन है, इसका श्रेय उन्हे जाता है। कथक की संगत करते हुए हमें यह ध्यान रखना है की हम अपना कुछ नहीं बजा रहे, हमें उनकी (नर्तक की) हर चीज़ का नहीं, हर एक चीज़, हर movement का ध्यान रखना है। जैसे अभी अंजना जी ने बादल से बूंद का गिरना दिखाया। तबले और पखावज के लिए यह बूंद गिरना भी महत्व रखता है क्यूंकि यह उन्हे भी दिखाना है संगत में। जो नृत्यांगना की उपज है, जो उसी वक्त होती है, उसे भी समझना है। जहां कथक में तेज़ी होती है, वहीं गायन के साथ बजाने मे बहुत ठहराव चाहिए। यहाँ तबले में मिठास चाहिए। हिंदुस्तानी गायकी में खयाल होता हे जो 48 मात्रा का होता है। झूमरा 48 मात्रा का होता है। पहले के ज़माने में 1-1.30 घंटे का खयाल होता था। संगत में तबले में धीरज होना चाहिए ताकि गायन में बाधा न हो। लेकिन अब सुनने वालों में भी इतने लंबे गायन में बैठने का ठहराव नहीं है। संगत करने में आपको अपने रुझान और समझ के साथ तैयार रहना होता है क्यूंकि वह आपको कभी भी इशारा कर सकते हैं सोलो बजाने के लिए। तब आपका सबक तैयार होना चाहिए। आज के समय में तय्यारी बहुत ज़रूरी है।

प्रश्न: आज आपके भतीजे ने सब उस्तादों के कायदे बजाये हैं। लेकिन अगर उनसे इस उम्र में कहा जाए कि आप किसी नर्तक या गायक का साथ दीजिये, तो क्या वो कर पाएंगे? क्या उसके लिए ज़्यादा तजुर्बा नहीं चाहिए?
मोहित: नहीं नहीं, वो उसके खून में है। मैं और आशीष नृत्य परंपरा से हैं — जयपुर घराना नृत्य के लिए जाना जाता है। इसीलिए और तबलेवालों के मुक़ाबले निशित को ज़्यादा दिक्कत नहीं होगी (नृत्य का साथ देने में), क्यूंकी यहाँ भी 24 घंटा कथक का ही माहौल रहता है।

Mohit Gangani


प्रश्न: क्या साथ देने के लिए कलाकार को ज़्यादा मँझा हुआ नहीं होना पड़ता है?
मोहित: हाँ, दिमाग तो खुला रहना ही चाहिए। रियाज़ और तैयारी पक्की होनी चाहिए।
आशीष: मैं तो यह कहता हूँ कि solo या संगत, दोनों में बराबर जान लगती है। सोलो में आप अपनी चीज़ बजा रहे हो तो आपका तब भी दिमाग खुला होना चाहिए।

प्रश्न: अदिति दीदी आपको मौका भी काफी देती हैं।
आशीष: बहुत ज़्यादा।
मोहित: आज के समय में, कथक और contemporary कथक के साथ, कोई अपने संगत कलाकारों को इतनी छूट नहीं देतीं जितनी अदिति दीदी देती हैं। जितना महत्व नृत्य का रखती हैं, मेरे खयाल से उससे 10 per cent ज़्यादा ही संगत को देती होंगी। बहुत संगीत समझती हैं दीदी – अपनी आधी से ज़्यादा ज़िंदगी दे चुकी हैं इस विधा को। हम तो उनके लिए बच्चे हैं।
फराज़: और इसी लिए दीदी ने नयी प्रतिभा के लिए यह बैठक शुरू की है, यह बहुत बड़ी चीज़ है। आज देखिये, 15 साल का बच्चा बजा रहा है, उसकी प्रतिभा देखिये आप।
मोहित: अदिति दीदी का इस चीज़ में बहुत एहम योगदान है।
आशीष: हमारा परिवार तो बहुत अर्से से उनके साथ जुड़ा हुआ है।
मोहित: मैं और आशीष तीसरी पीढ़ी हैं उनके साथ बजाने वाले। पहले हमारे गुरु, फिर हमारे चाचा, और अब हम दोनों हैं। पारंपरिक घर का ही जैसा रिश्ता है दीदी के साथ।

प्रश्न: Within में यह पहली बार देखा हमने की संगत कलाकार भी मंच के बीच में आ कर नृत्य का हिस्सा बने, वरना ज़्यादातर संगत वाले एक तरफ बैठे होते हैं।
फराज़: Within में भी दीदी का यही मानना था की जैसे जो दोनों पखावज बजा रहे हैं, वो भी production का हिस्सा हैं। उसी नृत्य का हिस्सा हैं। मैं पहले नहीं था इसमें। दीदी ने मेरे लिए खास जगह निकाली कि मैं अगर दीदी के साथ मंच पर गाना गाता हुआ आऊँगा, तो उसका क्या असर होगा। और वो लोगों को बहुत पसंद आया। हमें भी बहुत अच्छा लगा।
आशीष: मेरे खयाल से दिल्ली में यह आपको यहीं देखने को मिलेगा।
फराज़: यह सब दीदी के ideas हैं, और उन ideas को लोग आज-कल follow भी कर रहे हैं।

प्रश्न: जब पहली बार आप से मंच के बीच में आ कर नृत्य के साथ प्रस्तुत करने को कहा गया, तो आपको कैसा लगा?
फराज़: पहली सोच तो यही थी कि यार, यह तो बहुत अटपटी बात हो जाएगी, हम लोग कैसे बैठेंगे? लेकिन अब हम लोग इसके आदी हो गए हैं। और जब प्रोग्राम होता है, तो लोगों को बहुत पसंद आता है – के आपने सुर ही लगाया तो बहुत अच्छा लगाया, आपने धाई मारी तो बहुत अच्छी मारी।
आशीष: लेकिन उसमें हमें अपना पूरा दिमाग खुला रखना पड़ता है की कहाँ हमे धा मारना है, हमें हाथ यहीं रखने हैं, या हाथ खोलने हैं… पूरा दिमाग खोल के रखना पड़ता है, counts और movements याद रखने पड़ते हैं।
मोहित: दीदी का काम 95 फीसदी कथक ही होता है, 5 फीसदी दीदी उसको contemporary करती हैं। हम तीनों हैं तो पारंपरिक कलाकार परिवार से; हम जब नए-नए आए थे, एक बारी को तो लगा था की कुछ तो यह हमारे लिए नया है। लेकिन किसी भी चीज़ को एक बार आज़माने में कोई हर्ज़ नहीं है। बस वही किया हमने, और आज कोशिश करते-करते 8-10 साल हो गए हैं दीदी के साथ। वो सिलसिला ऐसा चला कि अब वो कोशिश नहीं, अब वो खासियत बन चुकी है हमारी।

प्रश्न: क्या आप लोग शुरू से ही choreography का हिस्सा होते हैं, या आपको बाद में बताया जाता है कि ऐसा संगीत देना है, और फिर आपको कितने rehearsals करने होते हैं?
मोहित: Rehearsals का तो पूछिए मत। पूरे महीने rehearsals होती हैं। जब रियाज़ होता है तब से हम दीदी के साथ जुड़े रहते हैं। तो दीदी का ऐसा होता है कि मोहित, आशीष, फराज़, कुछ try करो। इससे मिलाओ, इसके साथ कुछ बनाओ – research चलती रहती है।
आशीष: लेकिन यह तय होता है कि बीच में यहाँ आपने बजाना ही है। अब क्या बजाना है यह track के हिसाब से बजाना पड़ता है।
मोहित: जैसे science में research चलती है, वही बात है – हमारी scientist हमारी दीदी हैं, उनको assist हम लोग करते हैं।
फराज़: दीदी की प्रस्तुति है Timeless, उसमें पूरा recorded track बजता है और हम लोग live भी करते हैं। जब हमने पहली बार इस production को किया था तो हमारे लिए काफी मुश्किल था। पर दीदी ने कह-कह के, कह-कह के, कि नहीं, यह करना ही है...
आशीष: ऐसा नहीं कि सिर्फ track है, आपने साथ में बजाना भी है।
मोहित: आपने Within भी सुना होगा, उसमें भी हम लोगों ने ही बजाया है। वो जो recorded tracks हैं, शिव-शक्ति वगैरह, सब हमारा ही बजाया हुआ है। Studio में जाने के बाद surprise होता है कभी-कबार, कि बस घुसे तो पता चलता है कि इससे कुछ match करना है, तो वो कर के देखते हैं कि कुछ बना है, और उसका stage पे जाते-जाते तक नाम देते हैं – Within, Timeless।
फराज़: हम लोग तो सुबह 10.30 बजे से लेकर 5.30 बजे तक यहीं रहते हैं।

प्रश्न: आपके विचारों और योगदान की क्या जगह रहती है – अगर आप कहें कि यह ऐसे नहीं ऐसे लेते हैं... 
मोहित: ज़्यादातर दीदी हमारे विचार लेती ही हैं। हमारा रोज़ यहाँ दृष्टिकोण में रियाज़ रहता है, उसमें कुछ नया बनता है, कभी दीदी की तरफ से, कभी बाकी dancers की तरफ से, कभी हमारी तरफ से। वो भी बड़ा महत्व होता है कि हमारा भी वो role रहता है।
आशीष: Input तो काफी रहता है। जब दीदी का solo था, तो झीनी-झीनी — आपने सुना होगा... मोहित भाई कहीं गए हुए थे, और फराज़ भाई और मैं थे।
फराज़: दीदी शब्द ले के आयीं, और उन्होने हमें कुमार गंधर्व जी की भी बंदिश सुनाई, जो राग भैरव में है। उन्होने कहा कि इसको मुझे बनाना है, फराज़। अब हमें जो बंदिश सुनाई वो इतनी खतरनाक गा रखी थी कुमार गंधर्व जी ने, और उसके बाद दीदी ने उसे choreograph किया। बोली यह movements हैं और यह भाव हैं, कुछ कर के दिखाओ। काफी सारे राग हमने लगाए, सुबह से शाम हो गयी, हम इसी कमरे में बैठे थे। अब यह (आशीष) भी परेशान, हम भी परेशान। फिर एक राग निकल के आया, जोग। उसमें सुनाया तो दीदी ने कहा हाँ, यह अच्छा है। उसको आगे बढ़ाया।
आशीष: उसमें ताल हमने शुरू किया न तबला से न पखावज से, उसको हमने घुँघरू से शुरू किया, ठेका भी नहीं लगाया। घुँघरू से कैसे तबला आता है, फिर पखावज, फिर गाना, फिर बांसुरी, सब बंटा हुआ है।
मोहित: अगर आपने  सुना हो तो उसमें बहुत अच्छी एक rhythm है जो बहुत साफ सुनाई देती है, और वो है चुटकी। एक संगीतकर हैं साजिद अकबर, उन्होने उसे record में ऐसा डाला, झीनी-झीनी में, इतना अच्छा record किया उन्होंने उसको, आज वो rhythm एक बहुत एहम role निभाता है उसमें।
फराज़: दीदी को हर चीज़ से rhythm चाहिए।

Faraz Ahmed

प्रश्न: जिस आलाप से आप शुरू करते हैं, उससे बहुत अच्छा समा बंधता है।
फराज़: उससे mood बनाना पड़ता है, कौन सा राग है... अभी जो मैंने राग गाया था मेघ, वो बरसात का राग है। आलाप से बंदिश शुरू होती है, तो कोई भी dancer (के लिए) या solo भी गाएँगे तो पहले आलाप से उसका मिजाज़ बनता है, फिर बंदिश शुरू होती है।

प्रश्न: जो संगीत बनता है, उससे choreography बदलती है या...?
फराज़: नहीं, choreography तो set होती है, लेकिन संगीत बदलता है – जैसे मुझे इसके लिए यह चीज़ अच्छी नहीं लगी, तो मैं कह सकता हूँ की कुछ और आज़मा लो।
मोहित: कभी-कभी ऐसा भी होता है कि संगीत बन जाता है, और दीदी उसके ऊपर choreography करती हैं।

प्रश्न: कभी इस बात का एहसास होता है हम लोग इतने बड़े घराने से हैं...?
मोहित: हाँ, यह तो pressure हमेशा है ही। मैं और आशीष गंगानी परिवार से हैं, और फराज़ भाई मोरादाबाद घराने से हैं, जो गायन और सारंगी का बहुत बड़ा घराना है। मैं और आशीष ऐसे दादा के पोते हैं जिंहोने अपने समय पे इतना नाम किया है, आज उनके कई शागिर्द हैं जिनको legends में गिना जाता है। पहला नाम तो मैं राजेंद्र गंगानी जी का बोलूँगा, उसके बाद उनकी एक शिष्या हैं, उर्मिला नागर जी, प्रेरणा श्रीमाली जी, जयपुर से शशि शांखला जी – जिनपे आज legendary की मोहर लगती है, वो लोग हैं। इसलिए मेरे और आशीष पे बहुत pressure रहता है क्यूंकि एक छोटी सी बात है, कि हम उस घराने से, उस घर से हैं कि हम अगर अच्छा करेंगे, तो हमारे लिए एक ही बात होगी – ‘अरे इनके बेटे हैं, इनको तो अच्छा करना ही है’। अगर बुरा करेंगे, तब भी – ‘देखा, उनके बेटे हैं’। एक ही बात है, लेकिन उसको कहने के मायने दो हैं।
फराज़: हमारे भी घर में ऐसा ही है। मेरे उस्ताद ग़ुलाम साबिर ख़ान साहब और दादा सदीक़ अहमद ख़ान साहब से मैंने सीखा है। Pressure हम लोगों पे रहता ही है, चाहे हम कथक के साथ गाएँ या solo गाएँ, वो खानदानी मोहर तो रहती ही है, कि भाई यह इनके भाई हैं या इनके शागिर्द हैं। तो अगर एक सुर भी ऊपर नीचे हो जाता है तो यह होता है कि ‘अबे यार, यह रियाज़ में नहीं है अभी’। या अगर अच्छा गा दिया तो ‘यह तो गाता ही अच्छा है’।

प्रश्न: आज-कल के नर्तकों को यह एहसास है कि हमारे संगत कलाकार अपने आप में मंझे हुए कलाकार हैं?
आशीष: काफी बार होता है, बजाने के तरीक़े से भी होता है कि बजा रहे हैं, ठीक है, लेकिन वो कथक ही दिख रहा है। लेकिन जब हम संगत करते हैं, तो ऐसी संगत करनी चाहिए कि कथक भी चल रहा है तो हम अपना साथ में दिखाएँ – कि यह लोग बजा रहे हैं। नर्तक काफी appreciate भी करते हैं।
मोहित: उनके पास कोई चारा भी तो नहीं होता। क्यूंकि उनके गुरुओं के साथ भी बजा चुके हैं। उनके पास यह option ही नहीं है कि हमारी बुराई कर सकें अगर हम ख़राब भी बजा रहे हैं! पर आज-कल का दौर भी ऐसा है कि competition बहुत हो गया है, और हर चीज़ में। कथक ही नहीं, हर विधा में। और हमारे कथक और शास्त्रीय संगीत की जो विधाएँ हैं, उनमें सबसे बड़ी चीज़ है सम्मान और आदर। जैसे आपने बताया कि जो आज के युवा नर्तक हैं, उनमें इतना अदब है कि अगर बड़े नर्तक बैठे हैं तो उनसे इजाज़त लेते हैं, उनके लिए बोलते हैं कि मेरा सौभाग्य है कि वो मेरे साथ संगत कर रहे हैं। यह बहुत बड़ी चीज़ है कि आज के दौर में भी यह सब देखने को मिल रहा है। 

For non-Hindi readers, here is the interview translated into English.



Building blocks: Faraz Ahmed, Mohit Gangani, Ashish Gangani on the role of accompanist artists in dance

Just a few years back, musicians accompanying dancers live would be seen sitting on one side of the stage, facing the dancer. At the end of the performance, their names would be announced and that would be about all the credit that they got. But these musicians that we are going to talk about have been seen sitting either with their backs or their faces towards the audience, being very much a part of the performance, in the frame with the dancer. It is then that you come to realise that the accompanying musicians are a very important part of any performance. They are one of the building blocks that go into the raising of a production.
Faraz Ahmed, Mohit Gangani and Ashish Gangani are all members of Aditi Mangaldas’ Drishtikon repertory. Faraz is the seventh generation of the respected Moradabad gharana, continuing their tradition in Hindustani classical vocals and sarangi, and Mohit and Ashish are from the famous and widespread Gangani clan of the Jaipur gharana, known for Kathak and percussion. All three are now fixtures in every production and performance by Aditi and Drishtikon, and I have enjoyed hearing them perform each time.
Faraz sings, plays sarangi and composes, Mohit plays the tabla, Ashish plays the pakhawaj, and along with Faraz, they compose the rhythm for most of Drishtikon’s performances and productions. In this instalment of my Building Blocks series of interviews, I interviewed the impressive trio on accompanying musicians – how they hold dance performances together, how difficult but rewarding it is to adapt to a new style of dance despite being from long lineages of classical music, and the difference between performing solo and as an accompanist. I sat down with them after a rousing performance of three artists at a Drishtikon baithak in Delhi – Kathak by Anjana Singh, contemporary based on Kathak by Manoj Sonagra, and a tabla performance by the precocious Nishith Gangani, 15, the son of Yogesh Gangani. Mohit was on tal for his nephew, and all three accompanied the dancers, displaying their usual virtuoso flair.
As Mohit and Ashish pointed out, they are the third generation of their family to be working with Aditi. She is an accomplished Kathak exponent and guru who has also broken every set mould and framework with her Kathak based on contemporary. The same spirit runs through the work her students do in her repertory, and the musician trio says they’ve learnt a lot from working with different styles of dance, music and presentation. Productions like Within also break the norm when it comes to how accompanists participate in a dance recital, and all three credit Aditi with giving unprecedented visibility and freedom to musicians.

Ashish Gangani, Aditi Mangaldas and Mohit Gangani


When and how did you start your training?

Mohit Gangani: I was about four years old when I developed an interest... The atmosphere at home was like that. Plus, when we were young, we hadn’t planned to enter this tradition, but as we grew older, we developed an affinity for it. We thought, our elders have earned so much recognition, are we worthy of walking the same path? At four, I gravitated to the tabla.

Was there any pressure from the family?

Mohit: Pressure nahin kahoonga (not pressure exactly)... The pressure wasn’t like ‘you have to do this’, it was just... You are their child, you should do it. You are from that family, the next in line, there certainly was that pressure, yes. At four, I started learning from my uncle, since we have been trained within the family. I have learnt from my guru, Pandit Fateh Singh Gangani, and from Pandit Rajendra Gangani, whom you know as the famous Kathak maestro today, I have learnt laya and layakari. Because everything was at home (they come from a long lineage of music and a family with members of several branches in classical music and dance), we did not have to make much effort, so I thought, let’s pursue music. Nahin toh bachpan mein kaafi cricket ka shauq tha (I was otherwise interested in cricket as a child), but my mind was finally diverted from it, full and final (laughs). Gradually, we entered this tradition, and now, at 27, I’m still playing the tabla, and this will be my profession.

Ashish Gangani: I started at 10 with the tabla, since that is what I was fond of. Then I saw bhaiya (Fateh Singh Gangani) playing the pakhawaj, and so from the age of 14, I started learning the pakhawaj as my primary instrument, though I was also learning the tabla. I learnt pakhawaj with great interest – from my father, from bhaiya, and then from the (Kathak) Kendra, when I got admission to it, from Pandit Ravi Shankar Upadhyay. From there, I did a five-year course, and I used to go to his home to learn as well. Then I came to Didi (Aditi Mangaldas), and learnt a lot here, I heard many people and gained a lot from Drishtikon. So I have been learning, and now that I’m here, it’s good, I’m playing a lot, but there is always the desire to learn more, to keep learning.

Did you enter this field primarily because you were born into this family, or because you personally had an interest in it?

Ashish: No no, there was no insistence at home that I do this, but we heard music day and night, except for the times we went out to play! It just enters the bloodstream – ki karna chahiye, ke Gangani agar itna naam karein toh humein bhi shaayad kuch na kuch karna chahiye (if the Ganganis have earned such name and fame, we should try to do something as well).

Mohit: We are the sixth generation of this family that’s continuing in music, Ashish and I – we are cousins.

Faraz Ahmed: I started learning music at about 6 years old. My family also traditionally has been in music. That’s why – there was no pressure or anything, but I was interested in music, and so I learnt vocals and sarangi, as is traditional. My brother and I were a duo, we would sing together, but I am with Didi now, and now I am involved in dance as well. I have worked with a lot of people here, besides Didi herself. I was featured in one of her Baithaks, where I sang classical music. We have been musicians traditionally – I am the seventh generation following this tradition, in my home. Sarangi, vocal, tabla – it’s all part of the atmosphere in my home.

You are all so qualified as solo artists, so your experience as solo artists and as accompanists to dancers – how are they different, and where is your talent displayed best?

Mohit: My personal opinion is that we have a lot to learn, toh abhi establish hona toh bahut door ki baat hai (being established is a long way off). It is true that we are used to all the formats – the difference I feel is that when you play solo, that’s your own work. There is little creation of your own – in the sense that, like, our elders had kaydas. When we play solo, we play what has been made by those who came before. Apna creation bahut kam log kar paate hain. Like Ustad Zakir Hussain – he took the tabla to a whole new level. Tabla was called an accompanying instrument, now it is a solo instrument. Ustad Zakir Hussain and Kishan Maharaj have been instrumental in bringing the tabla to this level.
And as for the tabla, when accompanying in Kathak, it is very important to know that Kathak is a tradition in which, in the role that the tabla and pakhawaj have, you are not playing anything of your own. You are playing for them, for what they are performing. You have to follow every aspect, every movement of theirs, even the way a drop of water falls. The way Anjana (Singh, Kathak dancer, whom they accompanied that evening) performed the movement of raindrops, even the falling of one droplet is critical for the dancer and the pakhawaj in these things, because they are collaborating. And the biggest thing to remember in Kathak is the upaj, or the spontaneous performance of that dancer – you have to know the mind of that dancer if you have to play for them in that. That is a very big role for the tabla.
With vocals, the tablavadak needs a lot of thehrav (restraint and control). Kathak requires great pace from the tabla; vocals require great restraint, patience, a sweetness that doesn’t disturb. Because in Hindustani classical, they sing khayaals, which are 48 matras, or jhumras in 56 matras; these require a lot of thehrav. At that point, we can’t play like we do for Kathak – this requires a lot of patience, to play for so long. In earlier times, singers would sing a khayaal for an hour, an hour-and-a-half; it’s much shorter today.

Faraz: Singers would do just vistaar for two or two-and-a-half hours. Even the audience does not have that kind of patience now. Music has changed with the times.

Mohit: And if I talk about instruments, in today’s times, accompanists have to present their learnings according to their approach and interest, because performers can indicate that you play a solo at any time. The primary performer will give you a chance at some point. In that opportunity, you have to prove yourself. That is of great importance in accompaniment. And today, tayyari – that has to be solid.

Your 15-year-old nephew performed tabla today, and played the kaydas of various great gurus. But at this stage of his learning, for instance, can he accompany a dancer or a singer? Doesn’t that take more experience?

Mohit: No, that is in his blood. Ashish and I belong to the Jaipur gharana, which is known for dance. That is why it’s in his blood, and he won’t have much trouble playing accompaniment as compared to any other tabla player. Nishith also has the same environment at home – 24 ghante Kathak ka riyaaz hota rehta hai.
Of course, the mind has to be more open, the tayyari has to be solid.

Ashish: Solo and sangat both require sweating it out. In solo, you’re playing your own thing, so you have to have your own mind. And Didi gives us a lot of opportunity also.

Aditi does make sure the accompanists are recognized.

Mohit: Since you have spoken of her, I will say that in today’s time, in Kathak and contemporary based on Kathak, no one gives  her accompanying artists as much freedom and visibility as Aditi Didi. She gives maybe 10 per cent more importance to accompanying than to the dance, even. Bahut music samajhti hain Didi, she has given more than half her life to this art. We are very young, like her children.

Faraz: And this is why Didi has started this Baithak series to give new talent a platform. Look – there was a 15-year-old playing here today, and look at how talented he is.

Ashish: Our family has been associated with her for so long – we are the third generation to be playing with her.

Mohit: First it was our guru, then our chachaji, and now the two of us. It’s like a family relationship with her.

Faraz Ahmed and Aditi Mangaldas


In Within, I watched the music accompanists take the stage and be included in the frame of movement along with the dancers, not sitting to the side. That was a first for me as a viewer.

Faraz: That’s what we’re saying about Didi – like these two, when they sit at the front of the stage with their backs to the audience playing the pakhawaj, they become part of the dance. I was not part of this presentation at first – she created a special place for me so that when I make an entry, I sing with her, and that makes an impact. The audience liked it, and so did we. Didi has given musicians a lot of opportunity.

Even today, you were a part of the dance presentation rather than simply playing music to accompany (in the contemporary piece by Manoj Sonagra, they and the dancer went back-and-forth with the bols and the sounds in the absence of any instrumental music).

Ashish: I think that in Delhi, you will find this sort of thing only here (at Drishtikon).

Faraz: This is her thought, her ideas. And people are now starting to follow this.

When you were first asked to move out of the side, was it strange for you?

Faraz: Yes, at first we found it odd, how will we sit? But when the performance takes place, something very different emerges (from this kind of presentation). Plus, now, we’re used to it. People also appreciate it – aapne sur hi lagaya toh bahut achha lagaya, ya aapna dhai maari toh bahut achhi maari (if you hold a note, or play a rousing percussion piece, you suddenly get noticed). We become part of that thing.

Ashish: But we have to be both very open-minded and very alert – dha kahan maarna hai, haath khule rakhne hain, haath kahan ja raha hai (where you end the rhythm, where your hands are, when you are in the frame of movement). You have to be alert – keep counts, remember the dancer’s movements, which movement is at which count. Your dimaag should be khula (open).

You have to understand the other forms as well – Kathak, contemporary dance etc?

Mohit: Absolutely. 95 per cent of Didi’s work is classical, 5 per cent she does contemporary. The biggest thing is, we belong to a classical family. When we were new, we found it unfamiliar at first. But we thought, everything should be tried once. Aur try karte karte ab dus saal ho gaye hain Didi ke saath. Silsila aisa chala ki ab try nahin, ab woh hamara zone ban chuka hai (we began by trying, and now we’ve been working with Didi for 10 years. It’s not ‘try’ anymore, it’s our zone now).

In any choreography, are you part of it from the beginning? And how many rehearsals do you have to do with the dancers?

Mohit: Oh, don’t ask! We rehearse from morning to night, all month. The way Didi comes up with a concept or a production – she doesn’t just do traditional Kathak repertoire. We are part of it right from the beginning. She’ll tell me or Ashish or Faraz, let’s try something. She’ll say I have this, now you come up with something to match it. Research chalti rehti hai.

Ashish: It is already decided that here, in the centre, you will play. Now what you play, you have to come up with. And you have to play according to the theme and the track.

Mohit: It’s like research in science – except Didi is the scientist, and we are her assistants!

Faraz: Didi has a production called Timeless. It has recorded music, and we also play live to it. When we first did it, it was very difficult for us, but she badgered us till we did it. Live and recorded music are played together.

Mohit: Even in Within, the recorded portions (in contemporary), we have played and recorded them. Once we enter the studio, sometimes we get a surprise – we are asked to match something, and then slowly the whole the thing develops, and when it finally gets to the stage, it gets a name – Within, or Timeless, or any of the others... We are a part of it right from the start, since we are all permanent here.

Faraz: From 10.30 in the morning to 5.30 in the evening, we are right here at Drishtikon with her.

How much do you contribute to the shaping of a production – what role do your contributions play in its development?

Mohit: In considering opinions, when Didi has a movement, she’ll say Mohit, Ashish, Faraz, come up with something for this. Occasionally, what I play, it doesn’t fit and she asks me to change it. But most of the time, our inputs are included – she’ll ask what do you think should be played here, and if I say that, not this, then it’s included most of the time. Our opinions play a major role, I think. We have riyaaz at Drishtikon each morning, from about 11 to 12.30, and we develop new things, some from us, the dancers, Didi – it’s very important for us at that time that we have a role.

Ashish: Input toh kaafi rehta hai. When Didi does her solos, for instance in Jhini Jhini, Mohit bhai was out for a programme and Faraz bhai and I were there. Didi brought us the words – Jhini Jhini.

Faraz: She brought us the bandish, Jhini Jhini, and we tried it in many ragas. She also played Kumarji’s (Kumar Gandharva) bandish for us, that this is in raga Bhairav. She said I want to include this, Faraz. So we heard the bandish, and Kumar Gandharva ji’s rendition was so deadly, he is peerless. But Didi choreographed it, and said these are the movements, and these are the feelings, you try something with this. We tried many ragas, starting in the morning, and even till evening, in this very room, nothing really fit. Then finally, at the end of the day, we came up with the raga Jog. When she heard that, it clicked with Didi immediately. Then, as we developed it, there were variations in it too...

Ashish: The rhythm we began with was neither tabla nor pakhawaj, but ghungroos, not even the theka. And then how, from the ghungroos, follow the pakhawaj, the tabla, then vocals, the flute, disparate elements are brought together and seamlessly melded.

Mohit: If you listen to it carefully, there is a very unusual rhythm used in it, and that has been played using the snap of the fingers, the chutki (plays the beat). There is a music director named Sajid Akbar, he has given it this touch in the recording of Jhini Jhini for Inter-rupted. He has recorded it very well, and used this rhythm so innovatively, that rhythm plays a central role in that part of the performance today.

Faraz: Didi wants rhythm and music from everything.

Your alaap really adds to the mood.

Faraz: You have to create the right atmosphere with the ragas. Today, I sang raga Megh, barsaat ka raga. Whether it’s a bandish for a dancer or even singing solo, the alaap sets the mood. Then the bandish begins.

Does the development of the music ever contribute to a change in the choreography?

Faraz: No, the choreography that has been set remains that way, but the music – if we don’t like that piece at that point, we can say let’s try something else for this.

Mohit: Sometimes the music is set earlier, and the choreography is done according to that.

Do you ever feel the pressure of belonging to illustrious lineages of music?

Mohit: Yes, that is a major pressure, because Ashish and I belong to the Gangani parampara and Farazbhai belongs to the Moradabad gharana, a major gharana of vocals and sarangi. Ashish and I are grandsons of a man who has earned such fame, there are students of his today who are legends. The first name is of Pandit Rajendra Gangani, then there is Urmila Nagar, Prerna Shrimali, Shashi Shankhla... Many people called ‘legendary’ today have learnt from him. Hence, there is a lot of pressure on me and Ashish because... It’s a short sentence – if we do well, it will be said to us - ‘Arre inke bete hain (toh inko toh karna he hai).’ And if we do badly - ‘Dekha? Inke bete hain’. It’s the same thing, and two very different ways of saying it.

Faraz: I have learnt from my ustad, Ghulam Sabir Khan sahab, and my grandfather, Ustad Sadiq Ahmed Khan sahab. There is certainly a lot of pressure, whether we perform with Kathak or as solo artists, a khandani mohar (stamp of the lineage) – he is that one’s brother or that one’s student. If even one sur goes up or down, that comment comes quick - ‘yaar, abhi riyaaz bhi nahin hai’. Or if you sing well - ‘yeh toh gaata hi achha hai’.



Do young dancers today have enough appreciation for their accompanying artists?

Ashish: It happens sometimes, that when we play for Kathak, only the Kathak is being watched. But when we play, we should show what we have too – that look, we’re playing, people from this family (that’s the pressure of the lineage). The dancers definitely appreciate it, though.

Mohit: They have no option but to (respect the accompanists). We play with their seniors too, after all – they don’t have the option of criticising us even if we’re paying badly! Today’s times are like that, though – competition is so fierce in everything. And in the classical arts, the most important thing is respect. That’s hard to find. The dancers we work with today, they’re so gracious that if there’s a senior sitting with them, they seek permission and they mention them as well - ‘I’m fortunate to have so-and-so performing with me’. It’s a very big thing that we’re still getting to see this.
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Hence, a request - next time you’re at a performance, don’t forget to applaud the accompanying musicians as well.

Pics: Anoop Arora

Note: This interview in English first appeared on narthaki.com

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